Sunday, 17 May 2015

गुरु महारज की किरपा से कोई जन हानी नहीं हुई

गुरु महारज की किरपा से कोई जन हानी नहीं हुई ।

अंबाला-जयपुर एनएच 65 पर आज श्रद्धालूओं से भरी बस और ट्रक की
आमने-सामने की टक्कर हो गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि दोनों वाहनों के
परखच्चे उड़ गए और दोनों वाहनों में आग लग गई। हादसे के बाद बस में सवार
दर्जनों श्रद्धालू घायल हो गए। इस दौरान बस से निकलने को लेकर बस में
श्रद्धालूओं के बीच भगदड़ मच गई। गनीमत रही कि आग ने मौके पर ज्यादा जोर
नहीं पकड़ा वरना यहां एक बड़ा हादसा हो सकता था। सवारियों ने किसी तरहं
भाग कर अपनी जान बचाई और थोड़ी देर बाद देखते ही देखते दोनों वाहनों को
आग ने अपनी चपेट में ले लिया। शहर में फायर ब्रिगेड की कोई सुविधा नहीं
होने के कारण पुलिसकर्मी बाल्टियों से आग बुझाने की नाकाम कोशिश करते नजर
आए। जिस जगहं यह हादसा हुआ वहां एक गौशाला के अलावा पेट्रोल पंप भी है।
उधर, इस हादसे के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लग गया। मौके पर पुलिस
भी पहुंच गई और काफी संख्या में लोगों का हजूम भी लग गया। इस दौरान
प्राइवेट टेंकर की मदद से आग पर काबू पाने का प्रयास किया गया लेकिन
हादसे के दो घंटे बाद फायर ब्रिगेड की गाड़ी ने मौके पर पहुंच कर आग पर
काबू पाया।
जानकारी के अनुसार फतेहाबाद जिला के अलग-अलग गांवों के श्रद्धालू भूना से
मुकाम धाम में स्थित गुरू जंभेश्वर जी महाराज के दर्शन करने के लिए एक बस
में सवार होकर रवाना हुए थे। सिवानी से निकलते ही गैंडावास गांव के समीप
स्थित गौशाला के नजदीक सामने से तेज गति में आ रहे एक ट्रक से बस की
टक्कर हो गई। टक्कर इतनी भयंकर थी कि दोनों वाहन बुरी तरहं से
क्षतिग्रस्त हो गए और दोनों ही वाहनों में आग लग गई। इस दौरान कई
श्रद्धालू भी घायल हो गए और बाहर निकलने को लेकर बस में भी हडक़ंप मच गया।
किसी तरहं से सवारियों ने खुद को बाहर निकाला। थोड़ी देर बाद आग ने उग्र
रूप धारण कर लिया और देखते ही देखते दोनों वाहन धूं-धूं कर जलने लगे। शहर
में फायर ब्रिगेड की सुविधा नहीं होने के कारण आग बुझाने के प्रयास भी
नाकाम नजर आए। पुलिस कर्मियों ने बाल्टियों की मदद से आग पर काबू करने का
प्रयास भी किया लेकिन आग दो घंटे बाद घटनास्थल पर पहुंची फायर ब्रिगेड की
गाड़ी के बाद ही काबू पाई जा सकी। उधर, हादसे में घायल श्रद्धालूओं को
यहां के सरकारी अस्पताल में दाखिल करवाया गया है जहां 20 के करीब लोगों
को प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई जबकि दस लोगों को गंभीर अवस्था
में हिसार रैफर कर दिया गया।

Sunday, 15 March 2015

शको 363

मंगाली में जांभाणी हरिकथा का समापन



 
मंगाली में जांभाणी हरिकथा का समापन
 
हिसार|बिश्नोई सभामंगाली समस्त ग्राम वासियों के सहयोग से गुरु जंभेश्वर मंदिर, मंगाली में महंत स्वामी राजेंद्रानंद हरिद्वार की और से 7 मार्च से जांभाणी हरिकथा का प्रारंभ किया गया था। जो 13 मार्च को गुरु जंभेश्वर भगवान के द्वारा बताये गये 120 शब्दों का जाप करके पाहल बनाया तथा हरिकथा का समापन्न किया जिसमें महंत स्वामी राजेंद्रानंद हरिद्वार ने गुरु जंभेश्वर भगवान के द्वारा बताये गये 29 नियमों को विस्तार से बताया गया। स्वामी ने वक्षों की रक्षा करने तथा वन्य जीवों की रक्षा करने, कन्या भ्रूण हत्या करने तथा नशा मुक्ति के बारे में विशेष तौर पर बताया गया। स्वामी ने गऊओं की सेवा करना ही मनुष्य का परम धर्म बताया गया। जंभवाणी हरिकथा के दौरान डाॅ. ज्ञानवती बिश्नोई, बिश्नोई नर्सिंग होम, हिसार, बृजलाल खिचड़, सुभाष प्रधान बिश्नोई सभा, हिसार, ओम बिश्नोई जयपुर आदि उपस्थित थे।

Thursday, 22 January 2015

|| सुभाष चन्द्र बोस ||




                             
सुभाष चन्द्र बोस (बांग्ला: সুভাষ চন্দ্র বসু उच्चारण: शुभाष चॉन्द्रो बोशु, जन्म: 23 जनवरी 1897, मृत्यु: 18 अगस्त 1945) जो नेता जी के नाम से भी जाने जाते हैं, भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया जय हिन्द का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा" का नारा भी उनका उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया।कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की थी तो ब्रिटिश सरकार ने अपने ख़ुफ़िया एजेंटों को 1941 में उन्हें ख़त्म करने का आदेश दिया था।नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपाइन, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।
1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनायें माँगीं।
नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है। जहाँ जापान में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को उनका जन्म दिन धूमधाम से मनाया जाता है वहीं भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नज़रबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से सम्बन्धित दस्तावेज़ अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किये?